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ईद-उल-अज़हा का त्योहार त्याग और बलिदान का जज़्बा पैदा करता है, कुर्बानी को लेकर उलेमा ने जारी की गाइडलाइन।

सहारनपुर: ईद उल अज़हा यानी बकरा ईद का त्योहार मज़हब ए इस्लाम में बड़ा मक़ाम रखता है। इस त्योहार में इस्लाम के मानने वाले व्यक्ति अल्लाह की राह में क़ुर्बानी करते हैं।इस्लाम के जानकर कहते हैं कि नमाज़, रोज़ा, ज़कात और हज की तरह इस्लाम में क़ुर्बानी भी एक फ़र्ज़ इबादत है।

जमीयत दावतुल मुसलीमीन के संरक्षक व प्रसिद्ध आलिम इमाम मौलाना क़ारी इसहाक़ गोरा का कहना है कि बकरा ईद पेगमबर सुन्नत ए इब्राहिम है और इस्लाम में इसका बहुत महत्व है। यह त्योहार हमें अपने देश व इंसानियत की रक्षा के लिए डटे रहने का संदेश देता है, साथ ही यह त्योहार त्याग और बलिदान का जज़्बा पैदा करता है,बकरा ईद की ख़ुशियाँ मनाने वाले लोगों को इस बात का ख़्याल रखना चाहिए उनके किसी अमल से उनके पड़ोसियों या किसी व्यक्तियों को तकलीफ़ नहीं पहुँचे सबसे मिलकर और सदभाव के साथ त्योहार की ख़ुशियाँ बाँटें।

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गोरा ने कहा कि ग़रीबों को क़ुर्बानी का गोश्त ज़रूर दीजिए जो शरीयत में मज़हबी हुकुम है,गोरा ने बताया कि क़ुर्बानी करना सिर्फ़ किसी जानवर को ज़िबाह कर देने का नाम नहीं है, देश ही नहीं विश्व में आज भी बहुत से ऐसे लोग हैं जिन्हें एक वक़त का खाना नसीब नहीं होता ऐसे लोगों को क़ुर्बानी का गोश्त देना फ़र्ज़ है।

क़ारी इसहाक़ गोरा ने मुसलमानों को हिदायत करते हुए कहा है कि बकरा ईद पर इस बात का विशेष ध्यान रखें कि साफ़-सफ़ाई को इस्लाम में आधा ईमान बताया गया है इसी लिए इस्लाम के मानने वाले लोग साफ़ सफ़ाई का पूरा ख़्याल रखें और साथ ही ऐसे जानवर जिसकी क़ुर्बानी पर क़ानूनी पाबंदी है उनको हर साल की तरह इस साल भी ज़िबाह ना करें।

गोरा ने कहा कि इस बात का भी ध्यान रखें कि कोई भी यक्ति गलियों, रास्तों पर क़ुर्बानी हरगिज़ ना करें जिससे रास्ता चलने वालों को परेशानी हो। पैग़म्बर मोहम्मद साहब की सीरत में इससे बचने की खुली तालीम शरीयत की पुस्तकों में मौजूद है।

क़ुर्बानी के जानवर के फुजलात (गंदगी )रास्तों या अवामी जगहों पर ना फेंकें बल्कि नगर निगम द्वारा की गई व्यवस्था का प्रयोग करें। क़ुर्बानी करते वक़्त जानवर की फ़ोटो ना ली जाए और ना ही उसको सोशल मीडिया पर अपलोड किया जाए,क़ुर्बानी के जानवर का ख़ून नालियों में ना बहाया जाए ऐसा करना शरीयत में ना पसन्ददीदा अमल है,बल्कि इसको कच्ची ज़मीन में दफ़न कर दे, ताकी पैड पौधों की खाद बन सके,गोरा ने बताया कि क़ुर्बानी का गोश्त बेचना जाईज नहीं है।

इसको ख़ुद इस्तेमाल करना या मिलने वालों में हदया या ख़ास कर ग़रीबों में तकसीम कर देना चाहिए।

समीर चौधरी।